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खुशी का चुनाव

 


खुशी का चुनाव हमारे हाथ में है


मनोविज्ञान से जुड़ी एक प्रोफेसर ने अपनी कक्षा में पानी से भरा एक गिलास छात्रों को दिखाते हुए पूछा, 

'क्या आपमें से कोई ये बता सकता है कि इस गिलास का वजन कितना है?' कक्षा में कुछ हाथ उठे। छात्रों ने अलग- अलग जवाब दिए। किसी ने 50 ग्राम कहा तो किसी ने कुछ सौ ग्राम कहा। प्रोफेसर ने कक्षा को संबोधित करते हुए कहा, 'यह मायने नहीं रखता कि वास्तविक रूप में यह गिलास कितना वजनी है। मायने यह रखता है कि मैं इसे कितनी देर हाथ में उठाये रखती हूं। अगर मैं कुछ सेकंड के लिए गिलास को हाथ में रखती हूं तो यह बेहद हल्का महसूस होगा। लेकिन अगर मैं पूरे दिन इसे हाथ में लिए रहती हूं- तो शायद मेरा हाथ दुखने लगे।' प्रोफेसर ने समझाया,

'हमारी चिंताएं भी इसी तरह व्यवहार करती हैं।

अगर मैं कुछ सेकंड्स के लिए उन पर विचार करूं तो शायद मैं दिन भर दुखी न रहूं। लेकिन अगर दिनभर हम उन्हीं चिंताओं के बारे में सोचते रहें तो दुःख का यह बोझ हम नहीं उठा पाएंगे।'


सीख : खुशी का चुनाव हमारे हाथ में हैं।

हम किन भावनाओं को कितना वक्त देते हैं, 

हमारी आंतरिक खुशी इसी व्यवहार पर निर्भर

करती है।।


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