तमाशा खत्म नहीं हुआ, खेल जारी है....। एक मुसीबत खत्म हुई नहीं कि दूसरी शुरू... बिशनसिंग के कोई संतान नही थी। सारी उम्मीदें खत्म थी। बहुत डॉक्टर को दिखाया लेकिन बात नहीं बनी। उसे तथा उसके घर वालों को बिशनसिंग की पत्नी ही बांझ लगती थी। दोनों मियां मजदूरी कर पेट भरते थे। लेकिन औलाद न होने के कारण आये दिन दोनों के बीच खूब झगड़े होते। घर वाले भी झगड़े का कारण उसकी पत्नी को ही मानते थे। एक दिन सड़क पर मजदूरी करते हुए बिशनसिंग को एक ट्रक वाले ने टक्कर दी दोनों पैर टूट गए शुक्र है उसकी जान बच गई। पति की तीमारदारी के कारण उसकी पत्नी भी काम पर नहीं जा सकी और उसकी भी नोकरी जाती रही। वो घरों में झाड़ू-पोंछा करती थी। घर वालों के रोज के तानों और कंगाली से परेशान हो उसकी पत्नी पड़ोसन के कहने पर एक तांत्रिक के पास जा झाड़-फूक करा आई। और औलाद की दुआ के साथ घर आई। सब सामान्य ही चला रहा था। बिशनसिंग बिस्तर पर पड़ा था 1 महीने से उसके पैरों में प्लास्टर बंधा था। एक महीने बाद प्लास्टर खुला लेकिन अब बिशनसिंग बहुत लाचार, बीमार, हताश था। नोकरी भी दुबारा नहीं मिली थी। वो सारा दिन घर पड़ा रहता था। करीब ...

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